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महागुरु कृताकृताचार्य जी महाराज

"दिव्य ऊर्जाएं स्वयं प्रभु महाविष्णु की महाशक्तियां हैं, जो कि इस संसार में सब कुछ नियंत्रित और संचालित करती हैं | दिव्य ऊर्जाओं के प्रयोग से महागुरु जी पंचतत्वों को नियंत्रित करते हैं और प्रभु महाविष्णु के आदेशों के अनुसार हमारे संसार का संचालन करते हैं | "

महागुरु जी इस संसार को देवताओं की शक्तियों से पूरी तरह नियंत्रित करते हैं

  • पंचतत्व 
  • महामारी 
  • पूरे संसार में होने वाली चुनाव प्रक्रिया 
  • प्राकृतिक आपदाएं 
  • भूकंप 
  • बारिश
  • बाढ़ 
  • सूखा इत्यादि 

महागुरु जी के इससे पूर्व के जन्म

महागुरु जी प्रभु महाविष्णु के दिव्य शंख "पांचजन्य" के अंश अवतार हैं | पांचजन्य इस संसार की भौतिक रूप के कारक व् सहारक दोनों ही हैं और प्रभु महाविष्णु के अभिन्न अंग हैं | यह जन्म प्रभु महाविष्णु के आदेश के अनुसार धर्म रक्षा और कृतयुग को सम्पूर्ण करने के लिए लिया गया है |

पांचजन्य अवतार - प्रथम कृतयुग में

पांचजन्य अवतार - प्रथम कृतयुग में

पांचजन्य जी का जन्म माता लक्ष्मी, अमृत इत्यादि के साथ समुद्र मंथन के समय होता है | यह माता महालक्ष्मी के भाई और समुद्र देवता के पुत्र हैं |
विद्युत् जिह्वा - त्रेता युग में - दैत्यों के राजा - दैत्य अवतार

विद्युत् जिह्वा - त्रेता युग में - दैत्यों के राजा - दैत्य अवतार

पाञ्चजन्य जी प्रभु महाविष्णु की आज्ञा के अनुसार विद्युत् जिह्वा रूप में त्रेता में दैत्यों के कुल में जन्म लेते हैं | उनका विवाह रावण की बहन शूर्पनखा के साथ होता है | शूर्पनखा स्वयं देवी तिलोत्तमा का अवतार थी जिन्होंने देव कार्य करने के लिए जन्म लिया था | रावण द्वारा विद्युत् जिह्वा की हत्या किये जाने के पश्चात, शूर्पनखा ने अपने प्रारब्ध द्वारा प्रभु राम का जन्म होने के पश्चात रामायण के युद्ध की भूमिका रची| रामायण के युद्ध में प्रभु ने इस पूरी धरा को राक्षस विहीन कर दिया और बढ़ते अधर्म में धार्मिकों को छुटकारा दिलवाया | यह जन्म प्रारब्ध के अनुसार रामायण के युद्ध की भूमिका बनाने के लिए लिया गया था
भरत - प्रभु श्री राम के भाई - त्रेता के अंत में

भरत - प्रभु श्री राम के भाई - त्रेता के अंत में

प्रभु श्री राम के अवतार लेने के साथ उनके गण शेषनाग लक्ष्मण रूप में, पांचजन्य भरत रूप में, और सुदर्शन चक्र शत्रुघ्न रूप में राजा दशरथ के पुत्र बनकर धरती पर जन्म लेते हैं | इस प्रारब्ध में पुनः पांचजन्य जी के रूप भरत प्रभु के वनवास का कारण बनते हैं, जिससे प्रभु अपने अवतार की पूरी लीला रच सकें | प्रभु के वनवास के समय , उनकी चरण पादुका को राज सिंहासन पर रखकर चौदह साल पृथ्वी पर राज भरत जी द्वारा किया जाता है |
शंखासुर जन्म - कृष्ण अवतार के समय - द्वापर के अंत में

शंखासुर जन्म - कृष्ण अवतार के समय - द्वापर के अंत में

पांचजन्य जी इस जन्म में शंखासुर राक्षस के रूप में जन्म लेते हैं | श्री कृष्ण जन्म , प्रभु का सम्पूर्ण जन्म है | इस जन्म में प्रभु पांचजन्य , और सुदर्शन दोनों ही संसार को रचने बिगाड़ने वाले उनके अस्त्रों का प्रयोग करते हैं | इसलिए उन्हें उनके प्रिय गण की प्राप्ति के लिए , प्रभु के आदेश पर पांचजन्य जी शंखासुर अवतार ग्रहण करते हैं | यही जन्म,महागुरु जी के इस जन्म का भी कारक है और प्रारब्ध का निर्माण करता है | देवताओं के आदेश पर शंखासुर रूप में पांचजन्य जी , शांडिल्य कुल में उत्पन्न संदीपनी ऋषि के पुत्र का भक्षण कर जाते हैं | प्रभु से गुरु दक्षिणा के रूप में संदीपनी मुनि अपने बच्चे को मांगते हैं | जिसके लिए प्रभु समुद्र तल में पाताल लोक जाते हैं | प्रभु के बलराम जी के साथ पाताल लोक पहुँचने पर पांचजन्य अपने रूप में आ जाते हैं और प्रभु के कर कमलो में पुनः सोशोभित होते हैं | उसके उपरांत प्रभु यमलोक में जाकर पांचजन्य की ध्वनि करते हैं, जिससे संसार कांपने लगता है और यमराज मृत्यु को उल्टा कर, संदीपनी के पुत्र को लौटा देते हैं | परन्तु इससे पूर्व जब शंखासुर रूप में संदीपनी मुनि के पुत्र का पाचजन्य भक्षण कर जाते हैं तो संदीपनी मुनि शंखासुर को श्राप दे देते हैं, " जिस तरह मेरे पुत्र को हमारी ममता और प्रेम नहीं मिल सका, उसी तरह तुम्हे भी एक जन्म और लेना पड़ेगा, तथा माता पिता के प्रेम से वंचित रहना पड़ेगा" | पुत्र के वापस मिलने के बाद जब पूरी कहानी संदीपनी मुनि को प्रभु ने सुनाई तो उन्होंने "शंखासुर को उनके ही कुल में जन्म लेने का वरदान दिया "| और इस तरह पांचजन्य जी के अगले जन्म में महागुरु जी के रूप में आने के प्रारब्ध का निर्माण हुआ |
अनिरुद्ध जन्म - प्रभु श्री कृष्ण के पौत्र - द्वापर के अंत में

अनिरुद्ध जन्म - प्रभु श्री कृष्ण के पौत्र - द्वापर के अंत में

पांचजन्य जी अनिरुद्ध के रूप में पुनः जन्म लेते हैं , प्रभु श्री कृष्ण के पौत्र की तरह | वह उनके पुत्र पद्मनाभ जो की स्वयं कामदेव थे, के पुत्र के रूप में जन्म लेते हैं | इस जन्म में वह बाणासुर की पुत्री ऊषा के रूप में जन्म ली हुयी देवी तिलोत्तमा से विवाह करते हैं | इनके पुत्र वज्र से ही कलियुग की शुरुआत होती है |
महागुरु कृताकृताचार्य जी महाराज - प्रभु की सम्पूर्ण दैवीय शक्तियों  के साथ का अवतार

महागुरु कृताकृताचार्य जी महाराज - प्रभु की सम्पूर्ण दैवीय शक्तियों के साथ का अवतार

संदीपनी मुनि के श्राप और आशीर्वाद के फल से जो प्रारब्ध निर्मित हुआ, उसके अनुसार पांचजन्य जी का महागुरु जी के रूप में पुनः अवतार हुआ | इस अवतार में महागुरु जी, प्रभु महाविष्णु की सम्पूर्ण शक्तियों को दिव्य ऊर्जाओं के माध्यम से नियंत्रित करते हैं | महागुरु जी को उनके अवतार होने की जानकारी बहुत ही छोटी उम्र में थी और वे 8 वर्ष की आयु से, प्रभु महाविष्णु के आदेश के अनुसार, इस संसार के पूर्णतया नियंत्रण कर रहे हैं | ईश्वर के आदेश के अनुसार उन्होंने चरणों में मनुष्य जाति का उनकी शक्तियों से परिचय कराया और अंततः उनके दिव्य रूप के बारे में उन्हें बताया | यह जन्म कृतयुग / सतयुग के अंतिम चरण को लागू करने , धार्मिकों की रक्षा , अधर्मियों का विनाश और धर्म राज्य की स्थापना करने के लिए लिया गया है | Paanchjanya Ji, to honour Curse of Sandipani Muni, takes birth in his Kula and completes his curse. In this Janma, Mahaguru Ji carries all Mahashaktis of Lord Mahavishnu himself in the form of Divine Energies, and controls entire Universe. This Janma is to implement last Charan (stage) of Kritayuga and restore Dharma Rajya.

23 साल से महागुरु जी इस संसार का संचालन कर रहे हैं

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सरकारें बनाई
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प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा की
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लोगों को ईश्वर की आज्ञा के अनुसार जीवन दान दिया
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आप कोई भी न जीतने योग्य चुनाव भी जीत सकते हैं , हारने के बाद भी अपनी सरकार बना सकते हैं, अपने राज्य या देश को प्राकृतिक आपदाओं से संरक्षण प्रदान कर सकते हैं  या अपनी अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित कर सकते हैं | 

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करिए ईश्वर की शक्तियों का साक्षात्कार धरती पर

हाल ही में किये गए चमत्कार

महागुरु जी संसार में कुछ भी करने से दिन, हफ्ते या महीने पहले ही बता देते हैं, जैसे ही उन्हें ईश्वर से कोई कार्य करने का आदेश आता है | यह सब कुछ ईश्वर के आदेश के अनुसार किया जाता है और चमत्कार ही है | 

 

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